छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था,, एक नाई, एक खाती, एक काला लुहार
था.... छोटे छोटे घर थे, हर आदमी बङा दिलदार था,, छोटा सा गाम मेरा पुरा
बिग् बाजार था..।। . कितै भी रोटी खा लेतै, हर घर मे भोजऩ तैयार था,,,
बिटोङे पे घिया तौरी हो जाती,, जिसके आगे शाही पनीर बेकार था.. छोटा सा गाम
मेरा पुरा बिग् बाजार था।।। . दो मिऩट की मैगी ना, झटपट दलिया तैयार था,,,
नीम की निम्बोली और शहतुत सदाबहार था... अपणा घङवा कस कै बजा लेते, लख्मी
पुरा संगीतकार था,,, छोटा सा गाम मेरा पुरा
बिग् बाजार था।।। मुल्तानी माटी ते जोहड़ में नहा लेते, साबुन अर स्विमिंग
पूल बेकार था,,, अर फेर कबड्डी खेल लेते, कुन्सा म्हारे क्रिकेट का खुमार
था,,, छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था।।। बुढ़या की बात सुन लेते,
कुन्सा टेलीविज़न अर अखबार था,,, भाई नै भाई देख कै राज़ी था, सबमै घणा प्यार
था,,, छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था।।। वो प्यार, वो संस्कृति मैं
इब कड़े तै ल्याऊं, या सोच सोच कै मैं घणाए दुखी पाऊं। जै वोए टैम फेर
आज्या, तो घणाए मजा आज्या,,, मैं अपनी असली जिन्दगी जी पाऊं, अर मैं इस
धरती पै सो सो शीश झुकाऊं..
Tuesday, 30 December 2014
कविता जो दिल को छू गई..
एक कमरा था
जिसमें मैं रहता था
माँ-बाप के संग
घर बड़ा था
इसलिए इस कमी को
पूरा करने के लिए
मेहमान बुला लेते थे हम!
फिर विकास का फैलाव आया
विकास उस कमरे में नहीं समा पाया
जो चादर पूरे परिवार के लिए बड़ी पड़ती थी
उस चादर से बड़े हो गए
हमारे हर एक के पाँव
लोग झूठ कहते हैं
कि दीवारों में दरारें पड़ती हैं
हक़ीक़त यही
कि जब दरारें पड़ती हैं
तब दीवारें बनती हैं!
पहले हम सब लोग दीवारों के बीच में रहते थे
अब हमारे बीच में दीवारें आ गईं
यह समृध्दि मुझे पता नहीं कहाँ पहुँचा गई
पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था
अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं
फिर हमने बना लिया एक मकान
एक कमरा अपने लिए
एक-एक कमरा बच्चों के लिए
एक वो छोटा-सा ड्राइंगरूम
उन लोगों के लिए जो मेरे आगे हाथ जोड़ते थे
एक वो अन्दर बड़ा-सा ड्राइंगरूम
उन लोगों के लिए
जिनके आगे मैं हाथ जोड़ता हूँ
पहले मैं फुसफुसाता था
तो घर के लोग जाग जाते थे
मैं करवट भी बदलता था
तो घर के लोग सो नहीं पाते थे
और अब!
जिन दरारों की वहज से दीवारें बनी थीं
उन दीवारों में भी दरारें पड़ गई हैं।
अब मैं चीख़ता हूँ
तो बग़ल के कमरे से
ठहाके की आवाज़ सुनाई देती है
और मैं सोच नहीं पाता हूँ
कि मेरी चीख़ की वजह से
वहाँ ठहाके लग रहे हैं
या उन ठहाकों की वजह से
मैं चीख रहा हूँ!
आदमी पहुँच गया हैं चांद तक
पहुँचना चाहता है मंगल तक
पर नहीं पहुँच पाता सगे भाई के दरवाज़े तक
अब हमारा पता तो एक रहता है
पर हमें एक-दूसरे का पता नहीं रहता
और आज मैं सोचता हूँ
जिस समृध्दि की ऊँचाई पर मैं बैठा हूँ
उसके लिए मैंने कितनी बड़ी खोदी हैं खाइयाँ
अब मुझे अपने बाप की बेटी से
अपनी बेटी अच्छी लगती है
अब मुझे अपने बाप के बेटे से
अपना बेटा अच्छा लगता है
पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था
अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं
अब मेरा बेटा भी कमा रहा है
कल मुझे उसके साथ रहना पड़ेगा
और हक़ीक़त यही है दोस्तों
तमाचा मैंने मारा है
तमाचा मुझे खाना भी पड़ेगा.
इस कडकडाती ठंड में नहीं नहाने का बहाना...
इस कडकडाती ठंड में नहीं नहाने का बहाना करने
वालों के लिए स्नान करने के कुछ आसान तरीके,
आपको कौन सा तरीका पसंद है खुद चुन
लीजिए...........
,
1.....चोंच डुबा कर दो चार बूँदें हाथ में लेकर अपने
ऊपर छिड़कने को "चंचु" स्नान कहते हैं.....इस ठंड मे
ज़्यादातर लोग ये नीति अपनाते हैं...
.
2.....इससे भी श्रेष्ठ स्नान होता है "नल नमस्कार
स्नान" जो शीतॠतु में नल को "नमस्कार" करके
किया जाता है।
कई वीर साहस करके "नल" को "स्पर्श" कर लेते हैं। परंतु
ज्ञानी जन दुस्साहस की वर्जना करते हैं।
.
3.....इन सबसे सर्वश्रेष्ठ स्नान होता है। "जल स्मरण
स्नान" इस स्नान में परम ज्ञानी जन अपने बिस्तर में
बैठे बैठे "जल देवता" का स्मरण करते है।
'
4.... सबसे उत्तम स्नान है....किसी भी स्नान किए
हुए इंसान को दर्शन कर लीजिए..साक्षात स्नान
होने की अनुभूति होती....क्यूंकी आपने
तो सुना ही होगा..."जो तेरा है वो मेरा है....."
मतलब आपने स्नान कर लिया तो मुझे क्या ज़रूरत
है...??
उपरोक्त स्नानों से निम्न लाभ होते हैं।
(1)इन सभी स्नानों से जल बर्बाद नहीं होता है।
(2) हम इन सभी स्नानों के माध्यम से बहुत
बड़ी मात्रा में "अमूल्य जल" की बचत कर मानव
मात्र की सेवा कर सकते हैं।
.
आप भी करके देखिए बहुत पुण्य का काम है।
.
.
इस शीतॠतु में आप भी इस मैसेज को आगे भेजकर "जल
संरक्षण" के पुण्य कार्य में अपना अतुलनीय योगदान
देकर पुण्य-लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
वालों के लिए स्नान करने के कुछ आसान तरीके,
आपको कौन सा तरीका पसंद है खुद चुन
लीजिए...........
,
1.....चोंच डुबा कर दो चार बूँदें हाथ में लेकर अपने
ऊपर छिड़कने को "चंचु" स्नान कहते हैं.....इस ठंड मे
ज़्यादातर लोग ये नीति अपनाते हैं...
.
2.....इससे भी श्रेष्ठ स्नान होता है "नल नमस्कार
स्नान" जो शीतॠतु में नल को "नमस्कार" करके
किया जाता है।
कई वीर साहस करके "नल" को "स्पर्श" कर लेते हैं। परंतु
ज्ञानी जन दुस्साहस की वर्जना करते हैं।
.
3.....इन सबसे सर्वश्रेष्ठ स्नान होता है। "जल स्मरण
स्नान" इस स्नान में परम ज्ञानी जन अपने बिस्तर में
बैठे बैठे "जल देवता" का स्मरण करते है।
'
4.... सबसे उत्तम स्नान है....किसी भी स्नान किए
हुए इंसान को दर्शन कर लीजिए..साक्षात स्नान
होने की अनुभूति होती....क्यूंकी आपने
तो सुना ही होगा..."जो तेरा है वो मेरा है....."
मतलब आपने स्नान कर लिया तो मुझे क्या ज़रूरत
है...??
उपरोक्त स्नानों से निम्न लाभ होते हैं।
(1)इन सभी स्नानों से जल बर्बाद नहीं होता है।
(2) हम इन सभी स्नानों के माध्यम से बहुत
बड़ी मात्रा में "अमूल्य जल" की बचत कर मानव
मात्र की सेवा कर सकते हैं।
.
आप भी करके देखिए बहुत पुण्य का काम है।
.
.
इस शीतॠतु में आप भी इस मैसेज को आगे भेजकर "जल
संरक्षण" के पुण्य कार्य में अपना अतुलनीय योगदान
देकर पुण्य-लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
Hum naraz hain tumse,
SUNO...!
Hum naraz hain tumse,
Buhat naraz hain tum se,
K Bohat majbor ho na
tum ?
Bohat masroof ho na
tum ?
Humein to yaad karnay
ka,
K waqat barbad karnay
ka,
Tumhein to waqat he
kab hai?
Na tumko yaad atay hain,
Tumhain kitna satatay
hain
Par ab to maaf rakhna
tum,
Humein na yaad karna
tum
Tumhain na yaad ayen
gay
Na tumko yoon satayein
gay
Par jab tum hum ko bulao
gay,
Hum se jab milnay aao
gay,
To hum bhi tum ko bata
dein gay,
Buhat majbor hain hum
bhi
Buhat masrof hain hum
bhi
Humein bhi kam hain
kitnay,
Humein na he bulao tum,
Na hum ko yaad aao tum,
K hum naraz hain tum se
BOHAT NARAZ HAI TUM
SE...!!
Hum naraz hain tumse,
Buhat naraz hain tum se,
K Bohat majbor ho na
tum ?
Bohat masroof ho na
tum ?
Humein to yaad karnay
ka,
K waqat barbad karnay
ka,
Tumhein to waqat he
kab hai?
Na tumko yaad atay hain,
Tumhain kitna satatay
hain
Par ab to maaf rakhna
tum,
Humein na yaad karna
tum
Tumhain na yaad ayen
gay
Na tumko yoon satayein
gay
Par jab tum hum ko bulao
gay,
Hum se jab milnay aao
gay,
To hum bhi tum ko bata
dein gay,
Buhat majbor hain hum
bhi
Buhat masrof hain hum
bhi
Humein bhi kam hain
kitnay,
Humein na he bulao tum,
Na hum ko yaad aao tum,
K hum naraz hain tum se
BOHAT NARAZ HAI TUM
SE...!!
चाहत या ईच्छा...
चाहत या ईच्छा एक ऐसी चीज है जिसके वशीभूत होकर इंसान मुशीबतों को मोल लेता
है और जो भी मिलता है उससे कहते फिरता है , “ मेरे ऊपर तो मुशीबतों का
पहाड़ टूट पड़ा है.” ऐसे ही में एक सज्जन हैं – शर्मा जी . सिर्फ शर्मा जी
ही नहीं हैं , बल्कि शर्मा जी की तरह हमारे बीच अनेकों सख्स हैं . शर्मा जी
की श्रीमती जब गर्भवती हो गयी तो घर – आँगन में खुशी का माहौल छा गया –
सभी ने उम्मीद बाँध रखी थी कि लड़का ही होगा , लेकिन ईश्वर को कुछ और ही
मंजूर था , लड़का न होकर लडकी हो गयी . लड़का होने से जो चेहरे में चमक
होती है , वो घर के या बाहर के लोगों को नशीब नहीं हुआ .
माँ – बाप ने यह कहकर संतोष कर लिया कि चलो घर में लक्ष्मी आ गयी . बहन का
मुंह लटका हुआ था – यह उसके मुखारविंद से ही पता चल रहा था . हंसकर या रोकर
खुशियाँ मनाई गईं . छट्ठी के दिन न चाहते हुए भी मन मार कर एक उत्सव का
आयोजन किया गया जिसमें विशेषरूप से ससुराल वालों को आमंत्रित किया गया और
इस बात का ध्यान रखने की हिदायत कर दी गयी कि किसी भी तरह से उन्हें इस बात
का पता न चले कि लड़की होने से घरवाले नाखुश हैं . शर्मा जी ऊपर से तो खुश
नज़र आ रहे थे , लेकिन उनके बोडी लेंगुएज से साफ़ – साफ़ झलक रहा था कि वे
भी लड़की पैदा होने से प्रसन्न नहीं है. श्रीमती शर्मा का भी चेहरा उतरा
हुआ था इस बात को जानकार , जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए , क्योंकि माँ के लिए
सभी बच्चे बराबर हैं – लड़का , क्या लड़की. श्रीमती शर्मा डेलिवरी पेन से
तो निजात पा गयी थी पर एहसास किसी बुरे सपने की तरह खौफनाक अब भी बना हुआ
था. यही यदि लड़का होता तो बहिश्त ( स्वर्ग ) का सुख एहसास होता .
इस कटु सत्य को मैं इस आधार पर शेयर करना चाहता हूँ कि जब मेरी श्रीमती जी
को मालुम हुआ कि उसे लडकी हुयी है तो उसका दर्द दोगुना हो गया था और जब
दूसरी बार उसे पता चला कि लड़का हुआ तो उसका दर्द रफ्फू चक्कर हो गया .
जहां पहली बार मुझसे वह पेट दर्द का बार – बार शिकायत करती थी , वहीं दूसरी
बार इस पर कभी चर्चा ही नहीं की. मैंने अपनी पत्नी से सवाल भी कर दिए ,
लेकिन वह चालाकी से टाल गयी थी. मैंने भी उससे दुबारा सवाल करना उचित नहीं
समझा . जो भी हो मैंने निष्कर्ष निकालने में कोई चूक नहीं की थी कि माँ भी
लड़का ( पुत्र ) होने पर निहायत खुश होती है. ऐसा क्यों होता है , यह विषय
मनोविज्ञान का है और मेरे विचार में इस पर शोध होना चाहिए.
शर्मा जी की पत्नी पुनः गर्भवती हुयी तो घरवाले शशंकित थे कि कहीं इसबार भी
लडकी न हो जाय. लड़का होगा कि लडकी होगी पूर्वानुमान ही लगाया जा सकता है ,
भविष्यवाणी नहीं की जा सकती . शर्मा दंपत्ति भी आश्वस्त नहीं थे . सक कुछ
भगवान की मर्जी पर छोड़ दिया गया. दिन और समय आ गया . इस बार भी शर्मा जी
को लड़की हुयी . अब तो घर में एक तरह से मातम का माहौल छा गया. लोग खुलकर
अपना – अपना विचार प्रकट करने लगे. महिला चिकत्सक ने शर्मा जी को परामर्श
दी थी कि वे पत्नी का बंध्याकरण ( Sterilization ) करवा दे , लेकिन सास के
दबाव में आकर ऐसा करना मुश्किल हो गया. वक़्त के साथ – साथ इस प्रकार लड़के
की चाहत ने शर्मा जी को पांच बेटियों का पिता बना दिया . जब पांच हो ही
गईं तो एक बार और प्रयास किया जा सकता है – यह सोचकर आशा व निराशा के बीच
श्रीमती शर्मा पुनः गर्ववती हो गयी .
ईश्वर की लीला को कौन जान सकता है ? इस बार एक लड़का और एक लड़की याने
जुड़वाँ (Tween Babies ) बच्चे पैदा हुए . थोड़ी खुशी , थोड़ा गम का माहौल
घर में हो गया . लोगों ने यह कहकर संतोष कर लिया कि जो ईश्वर करते हैं , सब
अच्छे ही करते हैं . बड़े ही धूम – धाम से छट्ठी मनाई गयी . इस बार सबों
ने एक स्वर से बंध्याकरण ( Sterilization ) के लिए ‘हाँ’ कर दी . शर्मा जी
एवं श्रीमती शर्मा को भी कोई आपत्ति नहीं हुयी .
यह कहानी का पहला अध्याय है , दूसरा अब शुरू होता है :
शर्मा जी एक निजी कंपनी में लेखापाल ( Accountant ) हैं . मेरे घर के पास
ही किराए के मकान में रहते है. घर का किराया कंपनी दे देती है , लेकिन घर
खर्चा तो उन्हें ही चलाना पड़ता है. गाँव में माँ – बाप एवं बहन है . पिता
जी पेंशन की राशि से मैनेज कर लेते हैं . शर्मा जी को छ लड़कियों एवं एक
लड़के के खान – पान , कपड़े – लत्ते , सौन्दर्य प्रसाधन , पढाई – लिखाई ,
पर्व – त्यौहार , दवा आदि में मासिक क्या खर्च होता होगा , आप अनुमान लगा
सकते हैं . उनका मासिक वेतन करीबन पद्रह हज़ार रुपये हैं . वे घर खर्च को
कैसे मैनेज करते हैं , यह सोचनेवाली बात है. गंभीर चिंता का विषय है.
समस्या ही समस्या है . रविवार को साप्ताहिक अवकाश रहता है , लेकिन इनके लिए
बारहों महीने , तीन सौ पैंसठ दिन काम रहता है. क्या ग्रीष्म , क्या शरद,
क्या बसंत , क्या वर्षा – सभी ऋतुएं एक समान है. दूर से ही शर्मा जी को
पहचान सकते हैं . छरहरा बदन – लम्बे , गोरे – चिट्टे , दुर्बल काया , दोनों
गाल चिपके हुए , सर के बाल आधे काले आधे सफ़ेद , आँखों पर मोटे फ्रेम के
चश्में , चेहरे पर चिंता की रेखाएं .
आज किसी वजह से जिले भर में बंदी है. शर्मा जी फुरशत में हैं . मेरे पास आकर बैठ गये . मैंने ही बात प्रारंभ की :
शर्मा जी ! कैसे आना हुआ ? वो भी महीनों बाद .
क्या बताऊँ आप को ? इधर काफी मुशीबत में था .
किस बात से ?
एक रहे तब न बताऊँ ? एक समस्या सुलझाता हूँ , तबतक दूसरी आ जाती है .. बस
इसी तरह … आप तो सब कुछ जानते हैं . आप से क्या छुपाना ! इधर दो पार्ट टाईम
काम भी पकड़ लिया है , इसलिए कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहता हूँ . बच्चियों को
भी बच्चे की तरह ही समुचित शिक्षा देनी है ताकि पढ़ – लिखकर काबिल हो जाय ,
अपने पैरों पर खड़ी हो जाय , उपयुक्त घर – वर मिले .
आपका यह विचार तो प्रशंसनीय है , काबिले तारीफ़ है.
आप से अपना दुखड़ा सुनाता हूँ तो मन का बोझ हल्का हो जाता है , भले ही कुछेक घंटों के लिए ही क्यों न हो .
मुझसे एक बड़ी भूल , गलती हो गयी . मुझे परिवार नियोजन दो , नहीं तो तीन
बच्चियों के पैदा लेते ही करवा देना चाहिए था . मुझे किसी की सलाह नहीं
माननी चाहिए थी , यहाँ तक कि सासू जी का भी नहीं . अब देखिये , मैं पीस रहा
हूँ साथ – साथ बेचारी पत्नी भी . वो तो बच्चियों के पीछे सती हो गयी है.
दिन – रात कोल्हू के बैल की तरह खटती रहती है. मुझसे देखा नहीं जाता ,
सोचता हूँ कि आत्महत्या … ?
ऐसी घिनौनी बात सपने में भी आपको नहीं लानी चाहिए . मुशीबत किस पर नहीं आती
! मुशीबत से न तो घबड़ाना चाहिए न ही दुनियादारी से भागना चाहिए , बल्कि
एक पुरुषार्थी की तरह विषम परिस्थितियों में भी डटकर मुकाबला करना चाहिए.
शर्मा जी ! अब जो गलती हो गयी सो हो गयी , अब पछताए होत क्या , जब चिड़िया चुग गयी खेत !
बच्चियों को समुचित शिक्षा दीजिये . मुझसे जो मदद होगी मैं करूंगा , वादा करता हूँ .
बच्चियों को समुचित शिक्षा दीजिये . मुझसे जो मदद होगी मैं करूंगा , वादा करता हूँ .
आप पर मुझको बहुत भरोसा है . दो बच्चियों का एड्मिशन पैसे के अभाव से नहीं हो पाया है .
कितने रुपये देने हैं ?
इंग्लिश मीडियम स्कूल है , इसलिए फीस कुछ ज्यादा ही है . तीन हज़ार सात सौ .
अभी मैं देता हूँ . चिंता की कोई बात नहीं है . जैसे आपकी बेटी वैसी मेरी .
पहले मुंह – हाथ धोईये . भाभी जी के हाथ से बने आलू परोठे खाईये . चाय
पीजिये कमफोर्टेबुल फील कीजिये . ज्यादा टेंसन लेने की आवश्कता नहीं है.
हमने खुलकर दुःख – सुख की बातें की . हंसी – मजाक भी हुआ कि कैसे वक़्त निकाल पाते हैं भाभी जी के लिए … ?
हमने खुलकर दुःख – सुख की बातें की . हंसी – मजाक भी हुआ कि कैसे वक़्त निकाल पाते हैं भाभी जी के लिए … ?
मैं तो मौका देखकर … और आप ?
घर में मैं और आप की भाभी , बस दो ही जन हैं , जब मन चाहे , वक़्त निकाल ही
लेता हूँ , सभी लड़के बाहर काम करते हैं , साल में एक आध बार आ जाते हैं .
ऐसे फोन और मेल से समाचार का आदान – प्रदान होते रहता है.
हमने साथ – साथ जलपान किया . बड़ा आनंद आया . जाते वक़्त मैंने चार हज़ार
रुपये शर्मा जी को थमा दिए . उनके चेहरे पर जो खुशी देखी आज मैंने , मेरा
मन प्रफुल्लित हो गया इस कदर कि मैं उसे लफ्जों में बयाँ नहीं कर सकता
!!!!!!बीड़ी अब CIGARETTE बन गयी,.
बीड़ी अब CIGARETTE बन गयी,
चटाई CARPET बन गयी ।
मुक्केबाजी BOXING बन गयी,
कुश्ती हमारी WRESLING बन गयी।
गिल्ली डंडा CRICKET बन गया, हमारा भारत GREAT बन गया ।।
गाय हमारी COW बन गयी, शर्म हया अब WOW बन गयी ।
काढ़ा हमारा CHAI बन गया, छोरा बेचारा GUY बन गया ।
कठपुतली अब PUPPET बन गया, हमारा भारत GREAT बन गया ।।
हल्दी अब TURMERIC बन गयी,
ग्वारपाठा ALOVIRA बन गया ।
योग हमारा YOGA बन गया, घर का जोगी JOGA बन गया ।
भोजन 100 रु. PLATE बन गया, हमारा भारत GREAT बन गया ।
घर की दीवारेँ WALL बन गयी, दुकानेँ SHOPING MALL बन गयीँ ।
गली मोहल्ला WARD बन गया, ऊपरवाला LORD बन गया ।
रक्षाकवच HELMET बन गया, हमारा भारत GREAT बन गया ।।
माँ हमारी MOM बन गयी, छोरियाँ ITEM BOMB बन गयीँ ।
पिताजी अब DAD बन गये, घर के मालिक HEAD बन गये ।
INDIA UP TO DATE बन गया,
हमारा भारत GREAT बन गया ।
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है..
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है
झुकी हुई निगाह में, कहीं मेरा ख़याल था
दबी दबी हँसीं में इक, हसीन सा सवाल था
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
न जाने क्यूँ लगा मुझे, के मुस्कुरा रही है वो
वो शाम कुछ अजीब थी ...
मेरा ख़याल हैं अभी, झुकी हुई निगाह में
खुली हुई हँसी भी है, दबी हुई सी चाह में
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
यही ख़याल है मुझे, के साथ आ रही है वो
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है
वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है
झुकी हुई निगाह में, कहीं मेरा ख़याल था
दबी दबी हँसीं में इक, हसीन सा सवाल था
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
न जाने क्यूँ लगा मुझे, के मुस्कुरा रही है वो
वो शाम कुछ अजीब थी ...
मेरा ख़याल हैं अभी, झुकी हुई निगाह में
खुली हुई हँसी भी है, दबी हुई सी चाह में
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
यही ख़याल है मुझे, के साथ आ रही है वो
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है
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